Mar 30

Poem – लिए बैठा हूँ

उलझनों और कश्मकश में …
उम्मीद की ढाल लिए बैठा हूँ |
ए जिंदगी! तेरी हर चाल के लिए …
मैं दो चाल लिए बैठा हूँ ||
लुत्फ़ उठा रहा हूँ मैं भी आँख – मिचौली का …
मिलेगी कामयाबी हौसला कमाल लिए बैठा हूँ |
चल मान लिया दो-चार दिन नहीं मेरे मुताबिक …
गिरेबान में अपने ये सुनहरा साल लिए बैठा हूँ ||
ये गहराइयां, ये लहरें, ये तूफां, तुम्हें मुबारक …
मुझे क्या फ़िक्र मैं कश्तियां और दोस्त
बेमिसाल लिए बैठा हूँ ||

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